Monday, 25 April 2016

Poem Kalyugi Manav

मैं कपड़े साफ़ पहनता हूँ अब,
दिल का मैल छुपाने को,
मुस्कान जो मुख पर लाता हूँ,
तो, बस, जग को धोखा दे पाने को।

उन गलियों में,
करता हूँ आना जाना, 
जिनसे मेरी पहचान नहीं,
और भोले लोग समझते हैं ये,
इसके जैसी किसी की शान नहीं।

दो बच्चे घर पर भूखे हैं,
और गैरों में रेवड़ी, हम, बांटा करते हैं,
फटे हाल है किस्मत अपनी,
दिखावे में, यूँ ही हम शान बघारा करते हैं,

होंठों पर है मीठी बोली,
और मन में पाप की गंगा बहती,
लोग कहते हैं राक्षस रावण को,
पर क्या हैं, मेरे आगे उसकी हस्ती।

हम पुण्य का दिखावा करते हैं,
और घड़ा पाप का भरते हैं,
लोग हमारी कूटनीति को,
भली भाँति समझते हैं,
पर मजबूरी है उनकी, के 
वो हँस कर हमको सहते हैं। 

बच के रहना हमसे,
हम मानव जैसे बस दिखते हैं,
पर, सच मानो तो, 
कर्मों में झाँकने से, हमारे
शैतान भी, इस कलयुग में, डरते हैं। 

                                                       --- written by,
                                                             रजनीश शुक्ल 

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5 comments:

  1. "मैं कपड़े साफ़ पहनता हूँ अब,
    दिल का मैल छुपाने को"
    bahoot khoob :)
    http://yugeshkumar05.blogspot.in/

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    1. Thank you yugesh. It feels really great that you liked it. 😃

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    2. Thank you yugesh. It feels really great that you liked it. 😃

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  2. Kya baat hai Shukla ji (Y)

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