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गिरने से अगर हार हो जाती तो '
इन्शान कभी जीतता ही नहीं ,
राह में डगमगा जाने से चाह
यदि ख़त्म हो जाती तो इंसान
कभी जीतने का साहस करता ही नहीं।
पर कितनी भी कठिनाईयां हो राह में ,
लड़ता है इंसान हर परिस्थितियों के मार से ,
गिरता है और गिर कर सम्हलता है ,
ये इन्शान भी गजब मिटटी का पुतला है,
डरता नहीं किसी भी जटिल जंजाल से ,
झेल जाता है हर परिस्थितियों को बड़े ही प्यार से,
क्यों की समझदार हैं ये मिटटी के पुतले ,
जो जानते हैं ये की ,
हार होती नहीं राह में डगमगा कर गिर जाने से ,
पर होती है हार गिर के न सम्हल पाने से ....
इसीलिए तो कहते हैं हमको इंसान
और "जीत का दूसरा मेहमान "।
-----रजनीश शुक्ल
mast! is waqt aapke kavitaon ki sakht jarurat h,likhte rahiyega..achha lga padhkar,qyt vry encouraging!!!!
ReplyDeletei'll definitely keep it up.....
Deleteand your valuable comments are only the constant source of inspiration for me.....
thanks for such a wonderful comment
:-)