Friday, 9 November 2012

जीत का दूसरा मेहमान






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                                                     -----रजनीश शुक्ल  
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गिरने से अगर हार हो जाती तो '
इन्शान कभी जीतता  ही नहीं ,
राह में डगमगा जाने से चाह
यदि ख़त्म हो जाती तो इंसान
 कभी जीतने का साहस करता  ही नहीं।

पर कितनी भी कठिनाईयां हो राह में ,
लड़ता है इंसान हर परिस्थितियों के मार से ,
गिरता है और गिर कर सम्हलता है ,
ये इन्शान भी गजब मिटटी का पुतला है,
डरता नहीं किसी भी जटिल जंजाल से ,
झेल जाता है हर परिस्थितियों को बड़े ही प्यार से,

क्यों की समझदार हैं ये मिटटी के पुतले ,
जो जानते हैं ये की ,
हार होती नहीं राह में डगमगा कर गिर जाने से ,
पर होती है हार गिर के न सम्हल पाने से ....

इसीलिए तो कहते हैं हमको इंसान
और "जीत का दूसरा मेहमान "
                                                -----रजनीश शुक्ल 



2 comments:

  1. mast! is waqt aapke kavitaon ki sakht jarurat h,likhte rahiyega..achha lga padhkar,qyt vry encouraging!!!!

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    1. i'll definitely keep it up.....
      and your valuable comments are only the constant source of inspiration for me.....
      thanks for such a wonderful comment
      :-)

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