आजाद ये भारत है,
यहाँ आजादी का डंका बजता है,
जरा सिर उठा कर देखो, जनाब
कैसे हमारा तिरंगा लहरता है।
न समझना,
ये सिर्फ सड़कों पर, गलियों में,
मीनारों पर, दीवारों पर फहरता है,
ये तिरंगा,
बनकर लहू,
हर भारतवासी के रगों में दौड़ता है।
पहन कर चोला आज़ादी का,
हम आज़ादी का पाठ पढ़ाते हैं,
हर एक तानाशाहों को, प्रथम
मोहब्बत का अमृत घूंट पिलाते हैं,
और गर न माने वो, तब
हम भगत सिंह नमक ब्रम्हास्त्र चलाते हैं,
साथ राजगुरु , सुखदेव बवंडर बन कर,
उनपर कहर वर्षाते हैं,
ध्वस्त किया है, हमने
कई चट्टानी तानाशाहों को,
यहाँ मिल कर लड़े हैं,
माटी क लाल, ग़ुलामी के आकाओं से ,
आज़ादी हमें मिली है, बेशक
पर अब भी लड़ना बाकी है,
हम में जो शैतान छिपा है,
उसे मारना बाकी है।
आओ तिरंगे की खाएं, सौगंध
दे आज़ादी हम, अब
माँ बेहेन और बेटी को…
भूखे को उसकी रोटी को,
राजतंत्र को भ्रस्टाचारी से,
युवाओं को बेरोज़गारी से,
ये राह नहीं आसान, पर
मिलकर ही सब पुरे होंगे,
तिरंगे के जो अधूरे अरमान हैं, अब भी
हमारे कर्तव्य से ही पुरे होंगे।
रजनीश शुक्ल
यहाँ आजादी का डंका बजता है,
जरा सिर उठा कर देखो, जनाब
कैसे हमारा तिरंगा लहरता है।
न समझना,
ये सिर्फ सड़कों पर, गलियों में,
मीनारों पर, दीवारों पर फहरता है,
ये तिरंगा,
बनकर लहू,
हर भारतवासी के रगों में दौड़ता है।
पहन कर चोला आज़ादी का,
हम आज़ादी का पाठ पढ़ाते हैं,
हर एक तानाशाहों को, प्रथम
मोहब्बत का अमृत घूंट पिलाते हैं,
और गर न माने वो, तब
हम भगत सिंह नमक ब्रम्हास्त्र चलाते हैं,
साथ राजगुरु , सुखदेव बवंडर बन कर,
उनपर कहर वर्षाते हैं,
ध्वस्त किया है, हमने
कई चट्टानी तानाशाहों को,
यहाँ मिल कर लड़े हैं,
माटी क लाल, ग़ुलामी के आकाओं से ,
आज़ादी हमें मिली है, बेशक
पर अब भी लड़ना बाकी है,
हम में जो शैतान छिपा है,
उसे मारना बाकी है।
आओ तिरंगे की खाएं, सौगंध
दे आज़ादी हम, अब
माँ बेहेन और बेटी को…
भूखे को उसकी रोटी को,
राजतंत्र को भ्रस्टाचारी से,
युवाओं को बेरोज़गारी से,
ये राह नहीं आसान, पर
मिलकर ही सब पुरे होंगे,
तिरंगे के जो अधूरे अरमान हैं, अब भी
हमारे कर्तव्य से ही पुरे होंगे।
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