अब जीने लगे हैं हम भी
कल क्या था
और
कल क्या है
ये सोचते नहीं अब एक पल भी।
क्यूंकि
तकदीर में जो है
वो छीन न लेगा कोई
मेरी हाथ की रेखाओं को
मिटा न देगा कोई।
लाचार हूँ मैं जरा अपने ही कर्म से
वरना मिलने को बेचैन है
मंजिल भी मुझसे गर्व से।
- रजनीश शुक्ल
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