Saturday, 13 July 2013

सपनों का सौदागर


जीता था सपनों में मैं ,
मैं सपनों का सौदागर था ,
पहन ओढ़ सपनों को मैं ,
दुनिया से हर दिन मिलता था 

कहता था कोई पागल तो ,
कोई दीवाना कहता था ,
जलता था मेरा दिल भी ,
मगर खुशाल हमेशा रहता ता 

वो कहते थे मैं सुनता था , पर 
सपनों को हर पल बुनता था , 
कोई राह जो मैं चलता था ,
वो सपनो से ही जा मिलता था 

असल में ,
ये सपने गुरु थे मेरे ,
और मैं इनका आज्ञाकारी चेला था ,

ये सपने ही मुझे पढ़ाते  थे ,
और ये ही मुझे सीखते थे -

"बनना  है तुझको ऐसा ,
 जो इस धरा पे कोई न बन पाया  है । "

फिर देखना ,
सर्मएगा हर वो मिटटी का पुतला ,
जो देख खड़ा मुझे तेरे संग मुस्काया है। 
क्योंकि ,
सपना हूँ मैं तब तक ,
जब तक मुझे हकीक़त में ,
तू न बदल पाया है । 

शाकार  कर तू मुझे ,
तेरे जीवन को आकर मैं दूंगा,
क्योंकि
काला  कोयला हूँ आज,
पर कल का चमकने वाला मैं हीरा हूँ  । 
                                                     
                                              रजनीश शुक्ल

  

2 comments:

  1. good job rajnish..keep it up

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thanks @akshay bhai.....your appreciation is a constant source of inspiration for writers like us....
      wish you luck.....

      Delete