जीता था सपनों में मैं ,
मैं सपनों का सौदागर था ,
पहन ओढ़ सपनों को मैं ,
दुनिया से हर दिन मिलता था
कहता था कोई पागल तो ,
कोई दीवाना कहता था ,
जलता था मेरा दिल भी ,
मगर खुशाल हमेशा रहता ता
वो कहते थे मैं सुनता था , पर
सपनों को हर पल बुनता था ,
कोई राह जो मैं चलता था ,
वो सपनो से ही जा मिलता था
असल में ,
ये सपने गुरु थे मेरे ,
और मैं इनका आज्ञाकारी चेला था ,
ये सपने ही मुझे पढ़ाते थे ,
और ये ही मुझे सीखते थे -
"बनना है तुझको ऐसा ,
जो इस धरा पे कोई न बन पाया है । "
फिर देखना ,
सर्मएगा हर वो मिटटी का पुतला ,
जो देख खड़ा मुझे तेरे संग मुस्काया है।
क्योंकि ,
सपना हूँ मैं तब तक ,
जब तक मुझे हकीक़त में ,
तू न बदल पाया है ।
शाकार कर तू मुझे ,
तेरे जीवन को आकर मैं दूंगा,
क्योंकि
काला कोयला हूँ आज,
पर कल का चमकने वाला मैं हीरा हूँ ।
- रजनीश शुक्ल
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good job rajnish..keep it up
ReplyDeleteThanks @akshay bhai.....your appreciation is a constant source of inspiration for writers like us....
Deletewish you luck.....